शनिवार 3 अक्टूबर 2026 - 14:48
शहीद सुप्रीम लीडर से आयतुल्लाह तबसी की मुलाकात का दिलचस्प वाकया

हौज़ा इल्मिया क़ुम के उस्ताद-ए-खारिज और जामेआ मुदर्रिसीन हौज़ा इल्मिया क़ुम के सदस्य आयतुल्लाह नजमुद्दीन तबसी ने शहीद रहबर आयतुल्लाह उज्मा सैयद अली ख़ामेनेई के साथ अपनी विभिन्न मुलाकातों को याद करते हुए उनके विनम्र स्वभाव, शिष्टाचार, नैतिकता, आध्यात्मिक समझ, जनसाधारण से लगाव और विशेष रूप से छात्रों के प्रति सम्मान और स्नेह को अविस्मरणीय बताया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आयतुल्लाह नजमुद्दीन तबसी ने शहीद रहबर आयतुल्लाह उज्मा सैयद अली ख़ामेनेई के साथ अपनी विभिन्न मुलाकातों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके व्यक्तित्व में विनम्रता, शिष्टाचार, नैतिकता, ज्ञान और आध्यात्मिक समझ के साथ-साथ आम लोगों से गहरा लगाव था। विशेष रूप से छात्रों के प्रति उनका सम्मान और स्नेह उनके लिए कभी न भूलने वाला अनुभव रहा।

इल्मी बैठक में शहीद रहबर की विनम्रता

आयतुल्लाह तबसी ने एक मुलाकात का उल्लेख करते हुए बताया कि यह बैठक इमाम हसन अस्करी (अलैहिस्सलाम) की शहादत के अवसर पर आयोजित की गई थी, जिसमें लगभग 200 से 300 लोग मौजूद थे। उन्होंने इस बैठक में करीब 40 मिनट तक भाषण दिया। इसके बाद शहीद रहबर ने उनके भाषण में उठाए गए कुछ विषयों पर चर्चा की और लगभग 40 से 50 मिनट तक दोनों के बीच विचार-विमर्श हुआ।

उन्होंने बताया कि बातचीत के दौरान इब्ने अब्बास और अन्य विषयों पर भी चर्चा हुई। इसी अवसर पर शहीद रहबर ने ‘अन-नफी वत्तग़रीब’ नामक पुस्तक का उल्लेख करते हुए कहा कि यह एक अच्छी पुस्तक है, जिसमें फिक़्ही और ऐतिहासिक विषयों पर चर्चा की गई है और उन्होंने इसे शुरू से अंत तक पढ़ा है।

आयतुल्लाह तबसी के अनुसार, शहीद रहबर ने बताया कि अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद उन्होंने इस पुस्तक का पूरा अध्ययन किया था और कुछ वर्ष पहले भी इसे पूरी तरह पढ़ा था। इसी मुलाकात में आयतुल्लाह तबसी ने अपने अप्रकाशित दरस-ए-खारिज-ए-फ़िक़्ह के व्याख्यानों का टाइप किया हुआ मसौदा भी उन्हें दिया, जिसे शहीद रहबर ने अध्ययन और अपनी राय देने के लिए अपने पास रख लिया।

‘ज़िंदान दर इस्लाम’ का कई बार अध्ययन

आयतुल्लाह तबसी ने अपनी दूसरी मुलाकात का उल्लेख करते हुए बताया कि यह घटना 1372 हिजरी शम्सी, यानी लगभग 1993 की है। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘ज़िंदान दर इस्लाम’ शहीद रहबर को भेजी और रहबरी कार्यालय से पुस्तक के बारे में उनकी राय जानने की इच्छा व्यक्त की। इसके बाद कार्यालय से उन्हें सूचना मिली कि शहीद रहबर उनसे मुलाकात करना चाहते हैं।

उन्होंने बताया कि मुलाकात के दौरान लगभग 20 से 30 लोग मौजूद थे, लेकिन बाद में बातचीत अपेक्षाकृत निजी हो गई। इस अवसर पर शहीद रहबर ने पुस्तक के बारे में बातचीत करते हुए कहा कि उन्होंने इसे चार या पांच बार शुरू से अंत तक पढ़ा है।

आयतुल्लाह तबसी ने कहा कि यह पुस्तक लगभग 700 से 800 पृष्ठों पर आधारित थी और शहीद रहबर ने इसे एक महत्वपूर्ण और संदर्भ के योग्य पुस्तक बताया।

उन्होंने आगे बताया कि बाद में आयतुल्लाह मुहम्मद यज़दी ने नमाज़-ए-जुमा के पहले खुत्बे में इस पुस्तक का उल्लेख किया और उन्हें बताया कि खुत्बे से पहले उन्होंने भी शहीद रहबर के साथ इस पुस्तक के बारे में बातचीत की थी।

इब्ने तैमिया की पुस्तकों की प्रदर्शनी पर रोक लगाने का अनुरोध

आयतुल्लाह तबसी ने बताया कि मुलाकात के दौरान उन्होंने इब्ने तैमिया और उसकी पुस्तकों का विषय भी उठाया। उनके अनुसार, उन्होंने कहा कि कुछ सुन्नी विद्वानों ने भी इब्ने तैमिया के खिलाफ विचार व्यक्त किए हैं और उसे ज़िंदिक तथा धर्म से बाहर तक कहा है, लेकिन इसके बावजूद उसकी पुस्तकें बाजार में उपलब्ध हैं।

उन्होंने शहीद रहबर से अनुरोध किया कि ईरान में इब्ने तैमिया की पुस्तकों के वितरण और प्रदर्शन को रोकने के लिए निर्देश जारी किए जाएं।

आयतुल्लाह तबसी के अनुसार, शहीद रहबर ने पूछा कि क्या ये पुस्तकें बाजार में उपलब्ध हैं? उन्होंने जवाब दिया कि संस्कृति और इस्लामी मार्गदर्शन मंत्रालय इन्हें पुस्तक मेलों में लाता है। इस पर शहीद रहबर ने नाराजगी व्यक्त की और आगा मुहम्मदी को निर्देश दिया कि इस मामले को नोट करके इसकी निगरानी और कार्रवाई की जाए।

वर्षों बाद बेरूत में सामने आया परिणाम

आयतुल्लाह तबसी ने बताया कि कई वर्ष बाद जब वे बेरूत गए और ज़ाहिया इलाके की एक पुस्तक की दुकान में मौजूद थे, तो उन्होंने एक पुस्तक विक्रेता को दूसरे व्यक्ति से ईरान में इब्ने तैमिया की पुस्तकों की स्थिति के बारे में बातचीत करते हुए सुना।

पुस्तक विक्रेता बता रहा था कि ईरान के पुस्तक मेलों में जब भी किसी स्टॉल पर इब्ने तैमिया की पुस्तकें रखी जाती हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाती है और उन्हें बिक्री के लिए प्रस्तुत करने से रोक दिया जाता है।

आयतुल्लाह तबसी ने कहा कि उस समय उन्होंने दिल में कहा, “अलहम्दुलिल्लाह, मुझे अपना इनाम मिल गया।” यानी जिस समर्थन और कार्रवाई का उन्होंने शहीद रहबर से अनुरोध किया था, उसके प्रभाव उन्हें वर्षों बाद बेरूत में सुनने को मिले।

अंतिम मुलाकात

आयतुल्लाह तबसी ने अपनी अंतिम मुलाकात का उल्लेख करते हुए बताया कि जब उन्होंने शहीद रहबर का हाथ चूमना चाहा तो उन्होंने इसकी अनुमति नहीं दी। आयतुल्लाह तबसी ने कहा कि उन्होंने उनसे निवेदन किया कि हज़रत आगा सैयद, रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम) के वंशज, विद्वान और फ़क़ीह हैं और ये सभी गुण आप में मौजूद हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने हाथ चूमने की अनुमति नहीं दी। हालांकि बड़ी कठिनाई से उन्हें उनका बाजू चूमने का अवसर मिला, जिसे वे अपने लिए सम्मान और गर्व की बात मानते हैं।

उन्होंने अंत में कहा कि इन सभी मुलाकातों में उनके लिए सबसे प्रमुख बात शहीद रहबर की विनम्रता, शिष्टाचार, नैतिकता, आध्यात्मिक समझ, जनसाधारण से लगाव और विशेष रूप से छात्रों के प्रति उनका सम्मान और स्नेह था।

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